नवजात शिशुओं में होने वाले कई विकारों के लक्षण शुरुआती दौर में दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन जब इन शिशुओं को ऊपर का दूध या आहार देना शुरू किया जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। नवजात शिशु स्क्रीनिंग (NBS) जन्म के 3 से 7 दिनों के भीतर संभावित चयापचय (metabolic) या आनुवंशिक (genetic) विकारों की पहचान करने के लिए की जाने वाली जाँच है, ताकि जल्द से जल्द उपचार शुरू किया जा सके। इससे इन विकारों के कारण होने वाले दीर्घकालिक हानिकारक प्रभावों की गंभीरता को रोका या कम किया जा सकता है।
इस जाँच के लिए बच्चे की एड़ी में हल्की सी सुई चुभाकर (heel prick) फिल्टर पेपर पर रक्त की कुछ बूंदें एकत्र की जाती हैं।
नवजात शिशु स्क्रीनिंग सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बेहद फायदेमंद साबित हुई है। विकसित देशों में जन्म के समय नियमित रूप से स्क्रीनिंग की जाती है ताकि लगभग 50 चयापचय विकारों (metabolic disorders) की संभावना को खारिज किया जा सके।
भारत में भी चरणबद्ध तरीके से सभी नवजात शिशुओं के लिए इस सार्वभौमिक नवजात स्क्रीनिंग (universal newborn screening) की अत्यधिक आवश्यकता है।
सभी नवजात शिशुओं की निम्नलिखित विकारों के लिए जाँच की जानी चाहिए:
उच्च जोखिम वाले नवजात शिशुओं में इस स्क्रीनिंग की विशेष रूप से सिफारिश की जाती है, जैसे:
निम्नलिखित विकारों के लिए स्क्रीनिंग की जा सकती है:
जहाँ TMS/GCMS प्रयोगशालाओं में नमूने भेजने की सुविधा उपलब्ध हो, वहाँ आवश्यकतानुसार व्यक्तिगत मामलों के आधार पर विस्तृत नवजात स्क्रीनिंग की पेशकश की जा सकती है, जिसमें TMS द्वारा 30-40 IEM या GCMS द्वारा 110 IEM (Inborn Errors of Metabolism) की जाँच शामिल है।