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स्वास्थ्य जानकारी

सामान्य नवजात शिशु की देखभाल

सामान्य नवजात शिशु की गर्भकालीन उम्र 37 से 42 सप्ताह तक होती है, जन्म वजन 2500 ग्राम से 4000 ग्राम तक होता है, जन्म के तुरंत बाद रोते है और स्तनपान के लिए जल्द से जल्द मां के पास ले जाया जाता है।

माँ सबसे अच्छी नवजात शिशु देखभाल प्रदाता है। माँ की देखभाल में पूरी भागीदारी स्तनपान की स्थापना में मदद करती है। नवजात शिशु की उचित देखभाल शुरुआती दिनों में बच्चे के स्वास्थ्य, सुरक्षा और विकास को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

Newborn Care

स्तनपान

ब्रैस्ट क्रॉल यानी जब एक नवजात शिशु को उसकी माँ के पेट पर रखा जाता है, तो जन्म के तुरंत बाद, माँ की स्तन को स्वयं खोजने और पहला स्तनपान कब करना चाहिए यह तय करने कि उसकी सहज क्षमता होती है। स्तनपान को जन्म के तुरंत बाद अधिमानतः 1 घंटे के भीतर शुरू किया जाना चाहिए।

पहले तीन दिनों के दौरान स्तन के दूध की अपर्याप्तता होती है और यह सबसे कठिन समय होता है जिसमें परिवार स्तनपान के पूरक के लिए पाउडर का दूध खरीदते है। कम आत्मविश्वास वाली माँ और चिंतित परिवार के सदस्यों को यहाँ उचित परामर्श की आवश्यकता है कि पहले 2-3 दिनों के दौरान उत्पादित कोलोस्ट्रम की छोटी मात्रा एक स्वस्थ नवजात शिशु की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।

  • पाउडर दूध स्तनपान की स्थापना करने में देरी करता है और जो नवजात शिशुओं के लिए हानिकारक है।
  • एक सामान्य नवजात शिशु के शरीर में जन्म से पानी और खाने का भण्डार (ग्लाइकोजन) पर्याप्त होता है और इस स्तर पर वे स्तनपान की अपर्याप्तता के कारण शरीर में पानी की कमी या ग्लूकोस की कमी के जोखिम का मुकाबला करने की क्षमता रखते है।

तापमान

  • विशेष रूप से सर्दियों के मौसम में अल्पतपावस्था (हाइपोथर्मिया) का खतरा होता है।
  • तब बच्चे को उचित कपड़े, टोपी, दस्ताने और मोज़े के साथ कंबल उढ़ाने की आवश्यकता होती है।
  • जब बच्चे का धड़ incentives और हाथ-पैर गर्म और गुलाबी होते हैं, तो बच्चे के शरीर का तापमान सामान्य होता है।

शरीर की मालिश

भारत में शरीर की मालिश व्यापक रूप से प्रचलित है। मालिश माँ और शिशु की आत्मीयता को बढ़ाता है और अधिकांश शिशु इसका आनंद लेते हैं।

  • नवजात शिशु की मालिश तब की जानी चाहिए जब बच्चा 3 किलो से अधिक का हो और 2 सप्ताह के बाद जब गर्भनाल गिर गई हो।
  • यह परिसंचरण में सुधार करता है, मांसपेशियों के विकास में मदद करता है, माँ और बच्चे के बीच में सम्बन्ध बढ़ाने में मदद करता है, पोषण के स्रोत के रूप में कार्य करता है और वजन बढ़ाने में मदद करता है।
  • मालिश के लिए नारियल तेल और सूरजमुखी के तेल का उपयोग कर सकते हैं।
  • नवजात शिशु की मालिश के लिए सरसों का तेल, जैतून का तेल, खनिज तेल और सिंथेटिक तेल का उपयोग नहीं करना चाहिए।
  • मालिश गर्मियों में स्नान से पहले और सर्दियों में स्नान के बाद किया जाता है।
  • यह तब किया जाना चाहिए जब बच्चा जागा और सक्रिय हो, अधिमानतः स्तनपान के 1-2 घंटे बाद, एक गर्म कमरे में।
  • देखभाल प्रदाता को अपने नाखून को काटना चाहिए, अपनी अंगूठी और घड़ियों को हटा देना चाहिए। आमतौर पर 1 सत्र के लिए 15 मिनट लगता हैं, मालिश को आराम से बिना शरीर को रगड़ते हुए किया जाना चाहिए।

त्वचा और माथा की देखभाल

  • ब्रेस्टक्रॉल कराने के बाद, माँ को देने से पहले बच्चे का शरीर से खून, बलगम और मेकोनियम को साफ करना चाहिए।
  • अगले दिन बच्चे को गुनगुने पानी से सामान्य साबुन का उपयोग से नहलाया जाना चाहिए।
  • गर्भनाल गिर जाने तक डूबा के स्नान करने से बचें।
  • सर्ियों और ठंडे क्षेत्रों में, बच्चों को सप्ताह में दो या तीन बार स्नान कराया जा सकता है।
  • नवजात शिशुओं में त्वचा में पपड़ी आना आम बात है।
  • पपड़ी को हटाने के लिए बच्चे के शैंपू का इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • बच्चे की सिर की त्वचा और बालों को हर हफ्ते दो बार धोया जा सकता हैं।

अपरिपक्व त्वचा की देखभाल

  • अपरिपक्व शिशु को संभालने के लिए सख्त स्वच्छता का अभ्यास किया जाना चाहिए।
  • 2.5 किग्रा से कम वजन वाले शिशुओं को कपडे को गुनगुने पानी से गिला करके पोछना चाहिए (स्पंज बाथ)।
  • जिसके बाद एक सामान्य साबुन का उपयोग करके नियमित स्नान कराया जा सकता है।

गर्भनाल की देखभाल

  • गर्भनाल को सूखा और साफ रखा जाना चाहिए।
  • आमतौर पर 5 से 10 दिनों के बाद ये गिरता है।
  • सफाई के लिए गुनगुने पानी का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • नाल को हवा के संपर्क में रखना चाहिए।

डायपर क्षेत्र का देखभाल

  • माँ को बच्चे के लंगोट को बदलने के बाद हर बार साबुन और पानी से हाथ धोना चाहिए।
  • उन्हें प्रतिदिन 8-12 बदलावों की आवश्यकता हो सकती है।
  • गंदे डायपर को फेंकने के लिए ढक्कन वाले डस्टबिन का उपयोग करना चाहिए और पर्याप्त संख्या में बच्चे के कपड़े और डायपर का प्रावधान करना चाहिए।
  • माताओं को कपड़े के नैपकिन का उपयोग करना चाहिए जिसे अक्सर बदला जा सके।
  • डायपर क्षेत्र में अत्यधिक जलयोजन और घर्षण रहता है; नैपी क्षेत्र की सफाई के लिए गुनगुना गर्म पानी और गीले कपड़े का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • क्षेत्र को सूखा रखना महत्वपूर्ण है।
  • यदि डायपर का उपयोग किया जाता है, तो जिंक ऑक्साइड और पेट्रोलियम आधारित क्रीम का उपयोग किया जा सकता है।

मूत्र त्याग और आंत का संचलन

  • अगर एक बच्चे को पर्याप्त रूप से स्तनपान कराया जाए तो वे दिन में 6-8 बार पेशाब करते हैं।
  • यदि बच्चा कम पेशाब करता है तो इसका कारण दूध की अपर्याप्तता हो सकती है।
  • आमतौर पर स्तनपान करनेवाले बच्चे का मल पीले रंग का अर्ध-ठोस होता है और कभी-कभी वे प्रतिदिन मल त्याग नहीं करते है।
  • जब तक बच्चा स्वयं दूध नहीं पी रहा हो, उल्टी या बेचैनी के लक्षण नहीं दिखा रहा हो, तब तक चिंता का कोई कारण नहीं है।
  • गस्टोकोलिक रिफ्लेक्स होने के कारण, नवजात शिशु को स्तनपान कराने पर हर बार थोड़ी मात्रा में मल त्याग कर सकता है।

बच्चे को सोने में मदद

जन्म के 2-4 सप्ताह के बाद, बच्चा अपना नींद चक्र का पालन कर सकते है। बच्चा रात में जागना और दिन में सोना चाह सकता है। बच्चा आम तौर पर 16-18 घंटे सोता है और यह अवधि धीरे-धीरे समय के साथ कम हो जाती है।

  • जब बच्चा सो रहा हो तब माता को आराम करना चाहिए।
  • बच्चे को अच्छी तरह से सुलाना और ढकना चाहिए।
  • बच्चे को सोने से पहले अच्छी तरह गर्म रखे और दूध पिलाकर सुलाएं।
  • बच्चे के दिन के सामान्य चक्र को अनुकूल बनाने में मदद करने के लिए, जागते समय और दिन के समय प्रकाश में रखें और रात में न्यूनतम प्रकाश का उपयोग करें (लाइट बंद करके उपयुक्त वातावरण प्रदान करें)।

कपड़े

  • यह मौसम पर निर्भर करता है। कपड़ों की एक भीतरी परत और बाहरी परतों की हमेशा आवश्यकता होती है।
  • कॉटन के कपड़े सबसे अच्छे होते हैं।
  • शीतल (सर्दियों) में ऊनी कपड़े, 2-3 कपड़ो के साथ-साथ टोपी, मोजे और दस्ताने पहनाना चाहिए।
  • मुलायम कपड़ों को डायपर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।