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स्वास्थ्य जानकारी

रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (आर.ओ.पी)

Retinopathy of Prematurity

रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी (आर.ओ.पी.) समय से पहले जन्मे तथा कम वजन के शिशुओं का आंख के पिछले भाग का चित्रपट (रेटिनल) विकार है। यह बिना किसी दृश्य दोष के हल्के लक्षण का हो सकता है, या यह आक्रामक हो सकता है, जो की रेटिना के अलग होने से लेकर अंधापन के चरण तक बढ़ सकता है। आमतौर पर जाँच से गुजरने वाले नवजात शिशुओं में से एक तिहाई में आर.ओ.पी. की कुछ मात्रा में या कुछ हद तक देखि जा सकता है जो सौभाग्य से अधिकांश में अपने आप ही ठीक हो जाता है l प्रभावित शिशुओं में, कुछ में यह रेटिना के अलग होने से लेकर अंधापन के चरण तक बढ़ जाता है। समय पर जाँच और (आर.ओ.पी.) के उपचार से अंधापन को रोका जा सकता है और दृश्य अपंगता को कम किया जा सकता है।

आर.ओ.पी. के जोखिम वाले कारक: -

विभिन्न जोखिम कारक आर.ओ.पी. के विकास में योगदान करते हैं। वो हैं:

  • समय से पहले जन्म होना
  • कम जन्म वजन
  • अस्पताल में लंबे समय तक ऑक्सीजन की जरूरत
  • श्वासरोध
  • गंभीर संक्रमण
  • रक्त अल्पता
  • जन्मजात ह्रदय सम्बन्धी दोष
  • अधिक बार खून चढ़ाना
  • फेफड़ा विकसित न होना

जन्म का वजन और गर्भकालीन आयु -

गंभीर आर.ओ.पी. के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारक

बहुत कम जन्म के वजन वाले शिशुओं को गंभीर आर.ओ.पी होने का अधिक जोखिम होता है जिन्हें उपचार की आवश्यकता होती है। इसी तरह, आर.ओ.पी. की गंभीरता गर्भावधि उम्र के विपरीत आनुपातिक है। वर्तमान साक्ष्य से पता चलता है कि निम्न जन्म का वजन और गर्भकालीन आयु आर.ओ.पी के विकास के लिए सबसे अधिक अनुमानित जोखिम कारक हैं।

सामान्य तौर पर, अन्य जोखिम कारक बच्चे को बीमार होने का कारण होते हैं। इसलिए, बच्चे का गंभीर बीमार रहना आर. ओ. पी. का जोखिम बढ़ाता है।

  • (आर.ओ.पी.) की जाँच

किन शिशुओं के आँखों की जांच करनी है

निम्नलिखित में से किसी एक कारण के लिए शिशुओं के आंखों की जांच की जानी चाहिए:

  • जन्म के समय शिशु का वजन 2000 ग्राम से कम होना।
  • गर्भकालीन आयु 34 सप्ताह से कम होना।
  • गर्भकालीन आयु 34 से 36 सप्ताह के बीच होना तथा निम्नलिखित जोखिम कारकों में से एक या अधिक का उपस्थित होना:
    • हृदय एवं श्वसन क्रिया को बनाए रखने के लिए औषधियों का उपयोग।
    • लंबे समय तक ऑक्सीजन की आवश्यकता।
    • फेफड़ों का अपर्याप्त विकास (रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम)।
    • दीर्घकालिक फेफड़ों की बीमारी।
    • भ्रूण अवस्था में रक्तस्राव।
    • रक्त चढ़ाने की आवश्यकता।
    • नवजात शिशु में संक्रमण (सेप्सिस)।
    • एक्सचेंज ट्रांसफ्यूजन (रक्त परिवर्तन) की आवश्यकता।
    • मस्तिष्क के भीतर रक्तस्राव (इंट्रावेंट्रिकुलर हेमरेज)।
    • साँस रुकने की समस्या (एप्निया)।
    • जन्म के बाद वजन में अपेक्षित वृद्धि न होना।
  • ऐसे शिशु जिनकी चिकित्सीय स्थिति अस्थिर रही हो तथा जिन्हें नवजात विशेषज्ञ या बाल रोग विशेषज्ञ द्वारा उच्च जोखिम वाला माना गया हो।

आंखों की जांच कब करें

  • जन्म के 4 सप्ताह में पहली आंखों की जांच करनी चाहिए।
  • 2) 28 सप्ताह (गर्भ की आयु) से कम या 1200 ग्राम से कम वजन वाले शिशुओं को प्रसव के 2-3 सप्ताह में ही पहली बार जांच करानी चाहिए।

सरलता से, जन्म के 4 सप्ताह बाद आंखों की जांच की जानी चाहिए। हालांकि, अगर किसी बच्चे का 28 सप्ताह के गर्भकालीन समय से पहले जन्म या 1200 ग्राम से कम जन्म का वजन होने पर 2-3 सप्ताह में ही आरओपी आंखों की जांच होनी चाहिए।

आंखों की जांच की अवधि और आवृत्ति

प्रारंभिक जांच

  • अनुवर्ती आँखों का जांच की सिफारिश रेटिनल निष्कर्षों के आधार पर नेत्र रोग विशेषज्ञ द्वारा की जाती है।
  • सामान्य तौर पर, आँखों का जांच कम से कम हर दो सप्ताह तक जारी रहती है, जब तक:-
    • रेटिना का नस सामान्य पूर्णता तक ना पहुँचता हो, या
    • जब तक आरओपी सामान्य स्तिथि को प्राप्त ना करे।
    • जब तक आरओपी को उपचार की आवश्यकता ना हो।

परीक्षा का स्थान

  • नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU)
  • विशेष देखभाल नवजात इकाई (SCNU)
  • स्थिर शिशु के लिए नेत्र रोग विशेषज्ञ का क्लिनिक

उपचार का प्रकार

  • लेजर थेरेपी।
  • क्रायोथेरेपी।
  • उच्च रेटिना शल्य चिकित्सा ।

उपचार का उद्देश्य

उपचार का उद्देश्य रेटिना को अलग होने से रोकना और अंधापन की घटनाओं को कम करना है।